हाल ही में माइक्रोसॉफ्ट के एआई प्रमुख ने कहा था कि अगले 12-18 महीने में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), व्हाइट-कॉलर जॉब्स को खत्म कर देगा। इस बयान के बाद प्राइवेट नौकरी करने वाले लोगों के मन में यह डर और सवाल दोनों उठा कि क्या सच में ऐसा हो सकता है?
लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर लुइस गरिकानो (Luis Garicano) ने अपने X पोस्ट में लिखा है नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। अब इसी पोस्ट पर रिप्लाई करते हुए Zoho के फाउन्डर श्रीधर वेम्बू (Sridhar Vembu) ने अपनी प्रतिक्रिया दी है।
चलिए जानते हैं कि श्रीधर वेम्बू ने क्या कहा है और लुइस गरिकानो ने अपनी पोस्ट में माइक्रोसॉफ्ट के एआई प्रमुख की बातों को किस बेसिस पर ठुकराया है।
प्रोफेसर लुइस गरिकानो ने अपने पोस्ट में दावा किया है कि AI के आने से व्हाइट-कॉलर नौकरियों पर पूरी तरह निगेटिव असर नहीं पड़ेगा। उनका कहना है कि ऐसे कई प्रोफेशनल नौकरियां हैं जिनका पूरी तरह ऑटोमेशन होना कठिन है, क्योंकि इन कामों में इंसानी दिमाग, एक्सपीरियंस और डिसीजन मेकिंग की जरूरत होती है।
हालांकि गरिकानो मानते हैं कि AI की वजह से हमारे जीवन में बड़े और क्रांतिकारी बदलाव आ रहे हैं। लेकिन वे कहते हैं कि किसी एक काम का ऑटोमेशन हो जाने का यह मतलब नहीं है कि पूरी प्रक्रिया ही अपने-आप ऑटोमैटिक हो जाएगी। उनके अनुसार, व्हाइट-कॉलर नौकरियां अक्सर जटिल होती हैं, इसलिए उनका पूरी तरह से ऑटोमेशन फिलहाल आसान नहीं है
कंस्ट्रक्शन क्षेत्र का उदाहरण देते हुए गरिकानो सवाल उठाते हैं कि AI कानूनी और सामाजिक विवादों को कैसे सुलझाएगा। AI आज डॉक्यूमेंटेशन में भले ही काफी मददगार हो, लेकिन वह किसी पर्यावरण संगठन को यह समझाकर राजी नहीं कर सकता कि उसे अपना मामला वापस क्यों लेना चाहिए।
स्वास्थ्य क्षेत्र में भी पहले यह आशंका जताई गई थी कि AI आने से रेडियोलॉजिस्ट ( radiologists) की नौकरियों पर असर पड़ेगा, लेकिन हुआ इसका उल्टा। आज रेडियोलॉजिस्ट की मांग बढ़ी है, क्योंकि अधिकार और जवाबदेही की जगह कोई तकनीक पूरी तरह नहीं ले सकती।
ज़ोहो के फाउंडर ने क्या दी प्रतिक्रिया?
गरिकानो की पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए ज़ोहो के संस्थापक और वैज्ञानिक श्रीधर वेम्बू ने कहा कि तेजी से बदलते समय में, खासकर AI जैसे बड़े बदलाव के दौर में, समझदारी यही है कि हम हर तरह की जानकारी खुले मन से लें- चाहे वह AI के पक्ष में हो या उसके खिलाफ।
शुरुआत में अपने कुछ विचार बनाना ठीक है, लेकिन उन्हें बहुत पक्का मानकर नहीं बैठना चाहिए, क्योंकि नई जानकारी आने पर राय बदलनी पड़ सकती है। समय के साथ-साथ यही विचार अनुभव और समझ के आधार पर मजबूत विश्वास में बदलते हैं, लेकिन यह प्रक्रिया स्वाभाविक होनी चाहिए, जबरदस्ती नहीं। साथ ही, अपने विश्वास को अहंकार से नहीं जोड़ना चाहिए, वरना वह जिद या अंधविश्वास बन जाता है।
वेम्बू ने कहा कि जब किसी बात पर सच में मजबूत भरोसा बन जाए, तभी उस पर ठोस कदम उठाने चाहिए- क्योंकि बिना विश्वास के किया गया काम बेअसर होता है और सिर्फ विश्वास रखकर कुछ न करना भी बेकार है। फिलहाल AI का हमारी कंपनी और नौकरियों पर क्या असर पड़ेगा, इस बारे में मैं अभी शुरुआती चरण में हूं, यानी जानकारी इकट्ठा कर रहा हूं और अपनी राय बना रहा हूं।
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