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वर्ल्ड बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा ने हाल ही में वर्ल्ड बैंक की भूमिका और इसके बदलते स्वरूप पर खुलकर बात की है। निखिल कामथ की इंटरव्यू सीरीज ‘People by WTF’ में बंगा ने बहुत ही सरल शब्दों में समझाया कि आखिर वर्ल्ड बैंक का वजूद क्यों है।

उन्होंने कहा कि आज के दौर में वर्ल्ड बैंक का सबसे बड़ा मकसद गरीबी को जड़ से खत्म करना है। उनके मुताबिक, गरीबी के ताबूत में आखिरी कील ठोकने का सबसे सही तरीका लोगों को नौकरियां देना है। जब किसी को काम मिलता है, तो उसे सिर्फ पैसा नहीं, बल्कि जीने की उम्मीद और बेहतर भविष्य का भरोसा भी मिलता है।

अजय बंगा बताते हैं कि विश्व बैंक हमेशा से ऐसा नहीं था। इसकी शुरुआत ‘इंटरनेशनल बैंक ऑफ रिकंस्ट्रक्शन एंड डेवलपमेंट’ (IBRD) के तौर पर हुई थी, जिसे ब्रेटन वुड्स समझौते के तहत बनाया गया था। उस समय इसका मुख्य काम दूसरे विश्व युद्ध में तबाह हो चुके यूरोप और जापान को फिर से खड़ा करना था। उस दौर में विकासशील देशों पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा था।

बंगा ने कहा कि दिलचस्प बात यह है कि शुरुआती दिनों में इसी बैंक ने जापान की बुलेट ट्रेनों और फ्रांस के परमाणु संयंत्रों के लिए पैसा मुहैया कराया था। लगभग 20 साल बाद, जब यूरोप और जापान तरक्की की राह पर लौट आए, तब बैंक का ध्यान दुनिया के अन्य उभरते देशों की ओर गया।

पांच हिस्सों में बंटा है वर्ल्ड बैंक का ढांचा

आज विश्व बैंक पांच अलग-अलग इकाइयों के जरिए काम करता है। बंगा ने बताया कि इसमें ‘इंटरनेशनल डेवलपमेंट एसोसिएशन’ (IDA) दुनिया के 78 सबसे गरीब देशों की मदद करता है। वहीं, ‘इंटरनेशनल फाइनेंस कॉर्पोरेशन’ (IFC) प्राइवेट सेक्टर में निवेश को बढ़ावा देता है। भारत इसका एक शानदार उदाहरण है।

अजय बंगा ने खुलासा किया कि आज भारत का सबसे बड़ा प्राइवेट बैंक, HDFC, असल में IFC के निवेश से ही शुरू हुआ था। इसके अलावा ‘मल्टीलैटरल इंश्योरेंस गारंटी एजेंसी’ (MIGA) कंपनियों को राजनीतिक जोखिमों से सुरक्षा देती है। इन सभी विभागों के जरिए हर साल बाजार में करीब 120 अरब डॉलर का निवेश किया जाता है।

भारत की बदलती भूमिका

भारत के सफर को बंगा ने काफी प्रेरणादायक बताया। उन्होंने कहा कि भारत कभी उन गरीब देशों की लिस्ट (IDA) में शामिल था जो मदद लेते थे, लेकिन आज भारत खुद IDA को दान देने वाला देश बन चुका है।

इसी तरह तुर्की, चीन और दक्षिण कोरिया ने भी अपनी स्थिति बदली है। वर्तमान में भारत विश्व बैंक के साथ मिलकर प्राइवेट सेक्टर और बुनियादी ढांचे के विकास पर ज्यादा ध्यान दे रहा है।

अजय बंगा के अनुसार लगभग 30,000 कर्मचारियों वाला यह संस्थान आज केवल अनुदान देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देशों की तरक्की की रफ्तार के साथ खुद को ढालता रहता है।

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