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भारत के राजनैतिक गलियारों में इन दिनों एक अजीबोगरीब घटनाक्रम वायरल है- ‘कॉकरोच जनता पार्टीइसे आप एक मजाक, व्यंग या सोशल मीडिया का मीम कह सकते हैं। लेकिन इसके गहरे सियासी मायने टटोले जाएं, तो यह वर्तमान भारतीय राजनीति और खासतौर से देश की सबसे पुरानी पार्टी ‘कांग्रेस’ के मुंह पर करारा तमाचा है। यह घटना इस बात की ओर भी इशारा कर रही है कि भारतीय राजनीति ‘राष्ट्रीय पार्टियों के अकाल या संकट काल’ से गुजर रही है। एक तरफ जहां सत्ताधारी दल भारतीय जनता पार्टी ने देश के कोने-कोने में भगवा झंडा तान दिया है, तो दूसरी तरफ बाकी राष्ट्रीय पार्टियां अपने वजूद की लड़ाई लड़ रही हैं।

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भारत निर्वाचन आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, देश में 2,500 से अधिक राजनीतिक दल रजिस्टर्ड हैं। लेकिन वर्तमान में कुल 6 मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय राजनैतिक पार्टियां हैं। इन पार्टियों के नाम हैं- भारतीय जनता पार्टी (BJP), भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC), बहुजन समाज पार्टी (BSP), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [CPI(M)], आम आदमी पार्टी (AAP) और नेशनल पीपुल्स पार्टी (NPP)

 

एक समय था जब राष्ट्रीय पार्टियों का मतलब पूरे देश की आवाज होता था, लेकिन आज भारतीय जनता पार्टी को छोड़कर बाकी सभी राष्ट्रीय दलों का वजूद उनके खराब दौर से गुजर रहा है।
 

एक नजर डालते हैं संकट से जूझ रही राष्ट्रीय पार्टियों की जमीनी हकीकत पर:

 

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) – आजादी के बाद दशकों तक देश पर राज करने और सबसे ज्यादा 7 प्रधानमंत्री देने वाली राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस वर्तमान में पूरी तरह दिशाहीन और नेतृत्व संकट से गुजर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बढ़ती लोकप्रियता, बीजेपी और क्षेत्रीय दलों के उभार, कांग्रेस की संगठनात्मक कमजोरियों के कारण कांग्रेस पार्टी जूनियर पार्टनर की भूमिका में आ गई है। ‘कॉकरोच जनता पार्टी‘ जैसा तीखा व्यंग्य सीधे तौर पर कांग्रेस की लाचारी पर चोट करता है, जो मुख्य विपक्षी दल होने के बावजूद जमीन पर सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी के आगे वैचारिक और सांगठनिक स्तर पर कमजोर हैवर्तमान लोकसभा में कांग्रेस के पास कुल 99 सीटें हैं। देश के राज्यों में कांग्रेस की मौजूदगी सिमटी हुई है, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और केरल (कांग्रेस की अगुवाई वाले यूडीएफ गठबंधन) में कांग्रेस के मुख्यमंत्री हैं। साथ ही झारखंड और तमिलनाडु कांग्रेस जूनियर या सीनियर पार्टनर के रूप में सत्ता में है।

 

बहुजन समाज पार्टी (BSP) – सोशल इंजीनियरिंग का बिखरता किला

एक दौर था जब उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी का दबदबा था। देश के दलितों की सबसे मजबूत आवाज होने का दावा करने वाली बीएसपी के पास भी राष्ट्रीय पार्टी का तमगा है लेकिन हकीकत में ये पार्टी भी हाशिए पर है। बहुजन समाज पार्टी राजनीतिक रूप से पूरी तरह वेंटिलेटर पर है। जिस राष्ट्रीय पार्टी का लोकसभा में प्रतिनिधित्व शून्य हो और जिसके पास देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश सहित पूरे भारत में सिर्फ 4 विधायक बचे हों, उसका राष्ट्रीय पार्टी कहलाना ही लोकतंत्र का अजीब विरोधाभास है। यही कारण है कि कॉकरोच जनता पार्टीजैसा व्यंग्य इन पार्टियों के असल वजूद के गायब होने पर एक तीखा कटाक्ष करता है। मायावती की अगुवाई वाली बीएसपी का कोर वोट बैंक का छिटकना और कैडर का बिखराव इस राष्ट्रीय पार्टी को विलुप्त होने की कगार पर ले आया है।

 

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया – मार्क्सवादी (CPIM)| पश्चिम बंगाल में वजूद हुआ शून्य

भारत में वामपंथी राजनीति का सबसे मजबूत चेहरा रही सीपीआई(एम) आज राजनीति के कहीं दूर किसी हाशिए पड़ी है। पश्चिम बंगाल में कभी वामपंथियों ने लगातार 34 साल तक एकछत्र राज किया था। यह वही दौर था जब केंद्र की राजनीति में भी इस पार्टी का इतना दबदबा था कि उसने कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार (UPA-1) को बाहर से समर्थन देकर किंगमेकर की भूमिका निभाई। लेकिन वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि पहले ममता बनर्जी की टीएमसी ने कम्युनिस्टों को सत्ता से बेदखल किया, और अब हालिया विधानसभा 2026 के चुनाव में बीजेपी ने प्रचंड बहुमत के साथ बंगाल में सरकार बनाकर कम्युनिस्टों के पुराने अभेद्य किले को पूरी तरह मटियामेट कर दिया।

विडंबना देखिए कि सीपीआई(एम) के संसद में सिर्फ 4 सांसद है। जिस पार्टी ने बंगाल पर 34 साल और केरल पर दशकों राज किया, आज उसके पैरों के नीचे से राजनीतिक जमीन खिसक चुकी है। केरल में सत्ता गंवाने और बंगाल में बीजेपी की सरकार बनने के बाद अब इस दल के राष्ट्रीय पार्टीहोने की कानूनी वैधता पर संकट आ गया है। देशभर की सभी विधानसभाओं में इस राष्ट्रीय पार्टी के पास महज 43 विधायक बचे हैं। चुनावी आंकड़ों की क्रूर हकीकत देखिए कि पश्चिम बंगाल में सीपीआई(एम) का एक ही विधायक है। इस शर्मनाक पतन ने सीपीआई(एम) के ‘राष्ट्रीय पार्टी’  होने के कानूनी दर्जे पर ही एक बहुत बड़ा और वाजिब सवालिया निशान लगा दिया है। इसका वजूद सिर्फ केरल की भौगोलिक सीमाओं तक सिमट कर रह गया है। तंज के तौर पर कहें तो, देश की मुख्यधारा की राजनीति में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ की प्रासंगिकता और चर्चा, सीपीआई(एम) राष्ट्रीय पार्टी से कहीं ज्यादा है।

 

आम आदमी पार्टी (AAP) — आंदोलन से राजनीति तक

भारतीय राजनीति के इतिहास में सबसे तेजी से ‘राष्ट्रीय पार्टी’ का दर्जा हासिल करने वाली अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी अपने सबसे चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रही है। महज एक दशक पुराने इस दल ने दिल्ली और पंजाब में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाकर और गोवा, गुजरात में पैर पसारकर राष्ट्रीय पार्टी का तमगा हासिल कर लिया, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर खुद को स्थिर विकल्प के रूप में स्थापित करने में जद्दोजहद करनी पड़ रही है।

 

आंकड़ों पर नजर डालें तो राष्ट्रीय स्तर पर इस पार्टी की स्थिति भी काफी सीमित दिखाई देती है। लोकसभा में आम आदमी पार्टी के पास केवल 3 सांसद हैं, जो पंजाब से आते हैं। दिल्ली सहित देश के अन्य राज्यों में लोकसभा चुनाव में पार्टी का खाता तक नहीं खुल सका। विधानसभाओं में ‘आप’ के पास 156 विधायक हैं। पंजाब में  92, दिल्ली में 62, गुजरात में 4 और गोवा में 2 विधायक आप पार्टी के हैं। इन चार राज्यों के बाहर, देश के बाकी सभी राज्यों की विधानसभाओं में आम आदमी पार्टी की मौजूदगी इस समय शून्य है। लेकिन इसे भी राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल है।

 

नेशनल पीपुल्स पार्टी बस नाम की राष्ट्रीय पार्टी

चुनाव आयोग की फाइलों में राष्ट्रीय पार्टी नेशनल पीपुल्स पार्टी की कहानी दिलचस्प है। भारत के उत्तर-पूर्व से राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा पाने वाली एनपीपी तकनीकी रूप से तो नेशनल पार्टी है, लेकिन देश के हिंदी बेल्ट या दक्षिण भारत की राजनीति में इसका कोई खास प्रभाव या दखल नहीं है। चुनाव आयोग के नियम (4 राज्यों में क्षेत्रीय पार्टी का दर्जा) की बदौलत यह दल राष्ट्रीय पार्टी तो बन गयी, लेकिन संसद की 543 सीटों वाली लोकसभा में इसका प्रतिनिधित्व शून्य है। राज्यों की विधानसभा सीटों में इसके पास कुल 50 विधायक हैं, जो केवल उत्तर-पूर्व के राज्यों की भौगोलिक सीमाओं में सिमटे हुए हैं। देश के हिंदी बेल्ट, पश्चिम भारत या दक्षिण भारत के करोड़ों वोटर्स के लिए इस राष्ट्रीय पार्टी का कोई वजूद ही नहीं है। विपक्षी ताकतों का भौगोलिक बिखराव ही साफ करता है कि देश में राष्ट्रीय पार्टियों का कितना बड़ा अकाल है।

 

बीजेपी का एकतरफा वर्चस्व और राष्ट्रीय पार्टियों का अकाल

राष्ट्रीय पार्टियों की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि चुनाव आयोग की फाइलों में नेशनलका ठप्पा होने के बावजूद, जमीनी स्तर पर इनका राष्ट्रीय मुद्दों और देशव्यापी विमर्श से कोई खास सरोकार नहीं है। अगर देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस को छोड़ दिया जाए- जिसका संगठन और कैडर आज भी कन्याकुमारी से कश्मीर तक हर राज्य में मौजूद है और जो राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी को टक्कर देने की कोशिश कर रही हैतो बाकी की तमाम राष्ट्रीय पार्टियां सिर्फ क्षेत्र विशेष तक सिमटी हुई हैं।  चाहे अरविंद केजरीवाल की आपहो जो दिल्ली-पंजाब तक सिमटी है, मायावती की बीएसपीहो जो यूपी की सीमाओं में वेंटिलेटर पर है, या फिर कम्युनिस्ट पार्टी और एनपीपी हों, ये सभी दल व्यावहारिक रूप से केवल अपने-अपने खास क्षेत्रों और क्षेत्रीय समीकरणों के दायरे में दम तोड़ रही हैं।

 

देश की सुरक्षा, विदेश नीति या राष्ट्रव्यापी आर्थिक नीतियों जैसे बड़े मुद्दों पर इनके पास न तो कोई स्पष्ट राष्ट्रीय दृष्टिकोण है और न ही जनता के बीच उसे ले जाने की सांगठनिक ताकत। भारत के राजनीतिक पटल पर राष्ट्रीय सोच वाली पार्टियों के अकालकी सबसे कड़वी हकीकत है। इस राजनीतिक अकाल के ठीक विपरीत बीजेपी का पूरे देश के राजनीतिक परिदृश्य पर एकतरफा दबदबा दिखाई देता है।

 

‘कॉकरोच’ को विज्ञान में एक ऐसा जीव माना जाता है जो हर विपरीत परिस्थिति में, परमाणु हमले के बाद भी जिंदा बच सकता है। राजनीति में ‘कॉकरोच पार्टी’ का विचार आना दरअसल इस बात का उपहास है कि आज विपक्ष में कोई भी ऐसा दल नहीं बचा है जो विपरीत परिस्थितियों में खुद को जिंदा रख सके या जनता के बीच अपनी प्रासंगिकता बचा सके। चुनाव आयोग की फाइलों में राष्ट्रीय पार्टियों की घटती संख्या और उनकी दयनीय स्थिति यह साफ बताती है कि देश में एक सशक्त, राष्ट्रीय सोच वाले विपक्ष का अकाल पड़ चुका है। जब तक ये पार्टियां अपने पुराने ढर्रे को छोड़कर जमीन पर जनता से दोबारा नहीं जुड़ेंगी, तब तक ‘कॉकरोच पार्टी’ जैसे तीखे सियासी व्यंग्य उनके वजूद पर सवाल उठाते रहेंगे।

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