Sri Lanka tea industry: मध्य पूर्व में जारी संघर्ष का असर अब श्रीलंका के प्रमुख चाय उद्योग पर भी दिखने लगा है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक ऊर्जा कीमतों में तेजी, निर्यात में गिरावट और बढ़ती लागत ने देश के 1.5 अरब डॉलर के चाय सेक्टर पर दबाव बढ़ा दिया है। इस उद्योग पर करीब 24 लाख लोगों की रोजी-रोटी निर्भर है।
निर्यात में बड़ी गिरावट
रॉयटर्स के रिपोर्ट के मुताबिक श्रीलंका की मशहूर सीलोन टी का लगभग आधा निर्यात मध्य पूर्व के देशों में होता है, जिसकी सालाना कीमत करीब 68 करोड़ डॉलर है। ऐसे में क्षेत्रीय तनाव का सीधा असर चाय कारोबार पर पड़ रहा है।
राज्य संचालित Export Development Board के आंकड़ों के मुताबिक, मार्च में चाय निर्यात से होने वाली कमाई सालाना आधार पर 17.3 फीसदी घटकर 11.47 करोड़ डॉलर रह गई।
इराक, जो श्रीलंका की चाय का सबसे बड़ा खरीदार है, वहां निर्यात 38 फीसदी गिर गया। वहीं संयुक्त अरब अमीरात को भेजी गई खेप में 93 फीसदी की भारी गिरावट दर्ज की गई। ईरान हर साल 80 लाख से 1 करोड़ किलोग्राम प्रीमियम श्रीलंकाई चाय आयात करता है।
बढ़ती लागत से मजदूर परेशान
ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी का असर चाय बागान मजदूरों पर भी पड़ रहा है। कई परिवार अब गैस की जगह लकड़ी जैसे वैकल्पिक ईंधन का इस्तेमाल करने लगे हैं।
चाय बागान मजदूरों की दैनिक मजदूरी 1,350 से 1,750 श्रीलंकाई रुपये के बीच है, जो राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन से थोड़ा ही अधिक है। विश्व बैंक की लोअर-मिडिल इनकम गरीबी रेखा के अनुसार आधे से ज्यादा मजदूर गरीबी में जीवन गुजार रहे हैं।
Movement for Plantation People’s Land Rights के संयोजक थंगावेल गणेशलिंगम के मुताबिक, बढ़ती लागत की वजह से बच्चों की स्कूल से अनुपस्थिति बढ़ रही है, लोग भोजन में कटौती कर रहे हैं और कई परिवार शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।
नए बाजार तलाश रहीं कंपनियां
Dilmah Ceylon Tea Company भी शिपिंग और लॉजिस्टिक्स संकट से जूझ रही है। कंपनी के चेयरमैन और मुख्य कार्यकारी दिलहान फर्नांडो ने कहा कि ईंधन और परिवहन लागत बढ़ने से महंगाई का दबाव बढ़ रहा है। कंपनी अब कनाडा, दक्षिण अमेरिका और अमेरिका जैसे नए बाजारों में विस्तार पर जोर दे रही है।
इस बीच श्रीलंका सरकार पहले ही ईंधन कीमतों में 40 फीसदी बढ़ोतरी कर चुकी है। सप्लाई सीमित की गई है और ऊर्जा बचाने के लिए बुधवार को सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया है।
चाय उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि यह संघर्ष लंबा चला तो आम परिवारों के लिए गुजारा करना और मुश्किल हो सकता है।
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