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ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को बंद कर देने के फैसले से दुनिया भर के बाजारों में चिंता बढ़ गई है। किस देश को इस फैसले से कितना असर पड़ेगा, इसको लेकर सभी चिंतित हैं।

बीते सोमवार को ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (Islamic Revolutionary Guard Corps) ने ऐलान कर दिया था कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से जहाजों को गुजरने नहीं दिया जाएगा। ब्रिगेडियर जनरल सदर इब्राहिम ने कहा है कि यह रास्ता अब बंद है और अगर किसी ने भी इसे पार करने की कोशिश की तो ईरान की नौसेना उन जहाजों को आग लगा देगी।

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स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज एक पतला लेकिन महत्वपूर्ण जलमार्ग है। यह 33 किलोमीटर चौड़ा है। यह जलमार्ग पर्शियन गल्फ को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है। हालांकि ईरान और ओमान दोनों ही इस रास्ते के पास अपने क्षेत्रीय जल क्षेत्र को नियंत्रित करते हैं, लेकिन स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग माना जाता है, जिससे होकर व्यावसायिक जहाज गुजरते हैं।

इस जलमार्ग से जहाजों के गुजरने का रास्ता केवल 2 मील जितना चौड़ा है। इसके बावजूद दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल और एलएनजी इसी रास्ते से होकर गुजरता है। सऊदी अरब, इराक और ईरान से बाहर जाने वाला तेल इसी रास्ते से निकलता है। इसके साथ ही कतर और यूएई से निर्यात होने वाली गैस भी यहीं से गुजरती है।

इस एशियाई देश को स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज बंद होने से पड़ेगा सबसे अधिक प्रभाव

जीरो कार्बन एनालिटिक्स (Zero Carbon Analytics) के मुताबिक, स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज के बंद होने से सबसे ज्यादा प्रभावित भारत या चीन नहीं बल्कि जापान को होगा। इसके बाद दूसरे और तीसरे नंबर पर दक्षिण कोरिया और भारत हैं।

जापान पर ज्यादा प्रभाव इसलिए क्योंकि जापान अपने तेल और गैस की आपूर्ति के लिए इस रास्ते पर निर्भर है। जापान के बाद दक्षिण कोरिया भी इस मार्ग के बंद होने से काफी प्रभावित होगा। वहीं भारत और चीन तीसरे और चौथे नंबर पर हैं।

दुनिया का 20 प्रतिशत तेल और प्राकृतिक गैस स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से होकर निकलता है। इसी कारण यह जगह एक चोक प्वाइंट बन जाती है, जिसे बंद कर देने से दुनिया भर में तेल और गैस की आपूर्ति कम हो जाती है।

चार एशियाई देश चीन, जापान, भारत और दक्षिण कोरिया इस स्ट्रेट से आने वाले 75 प्रतिशत तेल और 59 प्रतिशत एलएनजी गैस के प्रमुख उपभोक्ता हैं। इस रास्ते से निकलने वाला गैस और तेल लेने वाले सबसे बड़े खरीदार भारत और चीन हैं।

एम्बर (Ember) नाम की ग्लोबल एनर्जी थिंक टैंक अपने आंकड़ों में बताती है कि जापान का 87 प्रतिशत और दक्षिण कोरिया का 81 प्रतिशत कुल ऊर्जा उपयोग बाहर से आयातित फॉसिल फ्यूल से होता है। वहीं चीन की केवल 20 प्रतिशत ऊर्जा आपूर्ति बाहर से आयातित फॉसिल फ्यूल पर निर्भर है और भारत की लगभग 35 प्रतिशत है।

इसके साथ ही जापान और दक्षिण कोरिया दोनों ही बाहर से आयात होने वाले तेल और गैस पर निर्भर हैं। जापान के फॉसिल फ्यूल आयात में 71 प्रतिशत तेल और गैस शामिल है, वहीं दक्षिण कोरिया के फॉसिल फ्यूल आयात में 78 प्रतिशत हिस्सा तेल और गैस का है।

जापान बाहर से आयात होने वाले फॉसिल फ्यूल पर काफी हद तक निर्भर है। इसकी वजह यह है कि जापान के पास अपने घरेलू ऊर्जा संसाधन सीमित हैं।

दूसरे एशियाई देश भी खतरे में

कोलंबिया यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑन ग्लोबल एनर्जी पॉलिसी (Center on Global Energy Policy, Columbia University) के अनुसार ताइवान बाहर से आयात होने वाली गैस पर निर्भर है और उसका लगभग पूरा एलएनजी आयात स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से होकर ही आता है। ताइवान का लगभग एक तिहाई एलएनजी आयात भी इसी मार्ग से होता है। हालांकि पाकिस्तान में कुछ हद तक गैस उत्पादन होता है, लेकिन पाकिस्तान की स्थिति भी अन्य एशियाई देशों जैसी ही है।

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