सोमवार को ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के शेयरों में तेज गिरावट देखने को मिली। भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL), हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) के शेयरों में 10 फीसदी तक की गिरावट आई।
दरअसल, ब्रेंट क्रूड की कीमतों में इंट्राडे करीब 29 फीसदी की उछाल ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। बाजार को डर है कि अगर पेट्रोल-डीजल की कीमतें नहीं बढ़ाई गईं तो कंपनियों की अंडर-रिकवरी तेजी से बढ़ सकती है और इससे उनके मुनाफे पर दबाव आएगा।
शेयरों में 7-9% तक गिरावट
कारोबार के दौरान BPCL का शेयर 7.49 फीसदी गिरकर 326.25 रुपये के निचले स्तर पर पहुंच गया। HPCL में और ज्यादा दबाव दिखा और यह 8.67 फीसदी टूटकर 370.10 रुपये पर आ गया।
वहीं इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन का शेयर 7.29 फीसदी गिरकर 156.30 रुपये तक फिसल गया। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के बीच निवेशकों ने इन कंपनियों में मुनाफावसूली की।
ब्रोकरेज UBS ने बदली रेटिंग
विदेशी ब्रोकरेज UBS का कहना है कि कच्चे तेल और रिफाइनिंग मार्जिन में हालिया तेजी 2022 के तेल बाजार संकट की याद दिलाती है। इसी वजह से ब्रोकरेज ने IOC और BPCL की रेटिंग घटाकर ‘Neutral’ कर दी है, जबकि HPCL को ‘Sell’ रेटिंग दी है।
UBS के मुताबिक, भारतीय सरकारी तेल कंपनियों के इंटीग्रेटेड मार्जिन (रिफाइनिंग और मार्केटिंग) कच्चे तेल की कीमत बढ़ने पर दबाव में आ जाते हैं। पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतों या टैक्स में बदलाव की सीमित गुंजाइश और रुपये की कमजोरी (USDINR 92 vs 2022 में 79) इस दबाव को और बढ़ाती है।
ब्रोकरेज का कहना है कि अगर मुनाफा मार्केटिंग से रिफाइनिंग की तरफ शिफ्ट होता है तो इन कंपनियों को नुकसान होता है, क्योंकि उनका बड़ा कारोबार ईंधन मार्केटिंग से जुड़ा है।
टार्गेट प्राइस में भी कटौती
UBS ने तीनों कंपनियों के टार्गेट प्राइस भी घटाए हैं। IOC का टार्गेट 190 रुपये से घटाकर 175 रुपये कर दिया गया है। BPCL का टारगेट 425 रुपये से घटाकर 365 रुपये कर दिया गया है, जबकि HPCL का टार्गेट 540 रुपये से घटाकर 340 रुपये कर दिया गया है।
ब्रोकरेज ने FY27 और FY28 के लिए मार्केटिंग मार्जिन के अनुमान 43-45 फीसदी और 22-26 फीसदी तक घटाए हैं। वहीं इसी अवधि के लिए ग्रॉस रिफाइनरी मार्जिन (GRM) के अनुमान 30-48 फीसदी और 21-39 फीसदी तक बढ़ाए गए हैं।
UBS के मुताबिक, अगर मौजूदा सप्लाई व्यवधान कुछ हफ्तों तक जारी रहते हैं और इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान नहीं होता, तो रिफाइनिंग मार्जिन बढ़ने से मार्केटिंग मार्जिन में समान गिरावट आ सकती है। चूंकि ये कंपनियां जितना डीजल बेचती हैं उससे कम अपने रिफाइनरी में बनाती हैं, इसलिए यह स्थिति इनके लिए निगेटिव साबित होती है।
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