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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तेजी से इंडस्ट्री और रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन रहा है। इसके साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या AI का डेवलपमेंट पर्यावरण के लिए टिकाऊ साबित होगा या फिर ‘ग्रीन AI’ सिर्फ एक नया कॉर्पोरेट ट्रेंड है।

बिजनेस टुडे इंडिया के मोस्ट सस्टेनेबल कंपनीज समिट एंड अवॉर्ड्स में आयोजित एक पैनल चर्चा में एक्सपर्ट्स ने माना कि AI का विस्तार अब रुकने वाला नहीं है। चुनौती यह है कि इसे चलाने वाला इंफ्रास्ट्रक्चर एनर्जी, पानी और नैचुरल रिसोर्स पर अस्थिर दबाव न डाले।

AI के बढ़ते असर के साथ बढ़ी चिंता

TERI की अर्थ साइंस एंड क्लाइमेट चेंज डायरेक्टर सुरुचि भदवाल ने कहा कि डिजिटल सेवाएं आज की जरूरत हैं और डेटा सेंटर उनका आधार हैं। AI भी इसी व्यवस्था का अहम हिस्सा है। उन्होंने कहा कि AI का पर्यावरण पर असर बढ़ रहा है। इसलिए ऐसी तकनीकों को बढ़ावा देना जरूरी है जो कम बिजली और पानी का इस्तेमाल करें। उनका मानना है कि इस समस्या का समाधान तभी संभव है, जब सरकार, उद्योग और अन्य सभी पक्ष मिलकर काम करें।

एबीबी इंडिया के कंट्री सस्टेनेबिलिटी मैनेजर राजेश कुमार झा ने कहा कि बहस केवल बड़े मॉडल या बड़े डेटा सेंटर तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उनके अनुसार असली सवाल यह है कि प्रति मेगावाट या प्रति किलोवाट कितनी ‘इंटेलिजेंस’ हासिल की जा रही है। झा ने कहा कि स्मार्ट ग्रिड, बेहतर एनर्जी एफिशिएंसी, स्टोरेज सिस्टम और डिजिटलाइजेशन AI इंफ्रास्ट्रक्चर को अधिक टिकाऊ बनाने में अहम भूमिका निभाएंगे।

केपीएमजी इंडिया की नेशनल हेड ESG नम्रता राणा ने कहा कि AI को समस्या नहीं बल्कि समाधान के हिस्से के रूप में देखना चाहिए। उनके मुताबिक, मैन्युफैक्चरिंग, ट्रांसपोर्ट और कृषि जैसे क्षेत्रों में AI ऊर्जा खपत घटाने में मदद कर सकता है। इससे जलवायु लाभ उस संसाधन खपत से भी बड़ा हो सकता है जो AI तकनीक स्वयं करती है।

वहीं क्लाइमेट कलेक्टिव की पार्टनर जुही जोशी ने कहा कि सस्टेनेबिलिटी को नैतिक विकल्प की बजाय आर्थिक नजरिए से देखना होगा। उनका मानना है कि जब सस्टेनेबिलिटी आर्थिक रूप से व्यवहारिक बनेगी तभी उसका बड़े पैमाने पर विस्तार संभव होगा। उन्होंने कहा कि स्टार्टअप, नवाचार और बाजार आधारित प्रोत्साहन साफ-सुथरे AI इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास को आगे बढ़ाएंगे।

नीति ढांचे की कमी बड़ी चुनौती

चर्चा के दौरान एक्सपर्ट्स ने माना कि भारत में अभी AI और डेटा सेंटर की सस्टेनेबिलिटी को लेकर स्पष्ट नीतियां और रेगुलेटरी फ्रेमवर्क मौजूद नहीं है। 

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