केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने ग्रेट निकोबार डेवलपमेंट प्रोजेक्ट का बचाव करते हुए कहा है कि इसे सभी निर्धारित पर्यावरणीय मानकों और प्रक्रियाओं का पालन करने के बाद मंजूरी दी गई है। उन्होंने इस दावे को भी खारिज किया कि प्रोजेक्ट पर्यावरण की कीमत पर आगे बढ़ाई जा रही है।
प्रोजेक्ट में जा रहा है सिर्फ इतना हिस्सा
बिजनेस टुडे इंडिया के मोस्ट सस्टेनेबल कंपनीज समिट एंड अवॉर्ड्स में बोलते हुए यादव ने कहा कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट निकोबार द्वीप के कुल क्षेत्रफल के केवल 1.78% हिस्से को प्रभावित करती है और यह भारत की पोर्ट क्षमता और समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने के लिए महत्वपूर्ण है।
प्रोजेक्ट को लेकर उठ रहे सवालों और कांग्रेस नेता राहुल गांधी की आलोचना पर प्रतिक्रिया देते हुए यादव ने कहा कि किसी भी परियोजना को पर्यावरणीय मंजूरी तय मानकों और प्रक्रियाओं के आधार पर ही दी जाती है।
उन्होंने कहा कि ग्रेट निकोबार परियोजना को मंजूरी देते समय सभी पर्यावरणीय पहलुओं पर विचार किया गया था। इतना ही नहीं, इस मंजूरी की न्यायिक समीक्षा भी हो चुकी है।
यादव ने कहा कि भारत जैसे देश के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में आधुनिक बंदरगाह और संबंधित बुनियादी ढांचे का विकास आवश्यक है। उनके मुताबिक यह परियोजना देश की समुद्री सुरक्षा और पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर को नई मजबूती देगी।
पर्यावरणीय चिंताओं का जवाब देते हुए मंत्री ने कहा कि आलोचक परियोजना के वास्तविक भू-उपयोग को नजरअंदाज कर रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि पर्यावरणीय मानकों का पालन किया जा रहा है, तो क्या भारत को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में एक बड़ा बंदरगाह विकसित नहीं करना चाहिए?
पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने बताया कि परियोजना के तहत बड़े हिस्से को हरित क्षेत्र के रूप में सुरक्षित रखा जाएगा और प्रतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) की व्यवस्था भी शामिल की गई है।
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट में क्या होगा?
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट में ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, हवाई अड्डा, बिजली स्ट्रक्चर और टाउनशिप के विकास का प्रस्ताव है। हालांकि पर्यावरणविदों और सामाजिक संगठनों ने जैव विविधता, वनों और आदिवासी समुदायों पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर चिंता जताई है। सरकार लगातार कहती रही है कि सभी वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन किया गया है।
ग्रेट निकोबार बहस को व्यापक संदर्भ में रखते हुए यादव ने कहा कि भारत का अनुभव दिखाता है कि आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण एक साथ आगे बढ़ सकते हैं।
उन्होंने बताया कि 2014 से पहले देश में केवल 24-25 इको-सेंसिटिव जोन अधिसूचित थे, जबकि अब उनकी संख्या बढ़कर 391 हो गई है। इसी तरह टाइगर रिजर्व की संख्या 47 से बढ़कर 58 हो चुकी है।
भूपेंद्र यादव ने कहा कि भारत में रामसर साइट्स की संख्या भी 24 से बढ़कर 100 हो गई है। उन्होंने दावा किया कि विकास कार्यों को आगे बढ़ाने के साथ-साथ देश ने वन और हरित क्षेत्र के विस्तार में भी प्रगति की है।
रिन्यूएबल एनर्जी में भारत की तेज प्रगति
भूपेंद्र यादव ने भारत की क्लीन एनर्जी उपलब्धियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सौर एनर्जी उत्पादक बन चुका है और इस मामले में अमेरिका से भी आगे निकल गया है।
उनके मुताबिक देश ने नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में 53% की वृद्धि दर्ज की है और कई लक्ष्य तय समय से पहले हासिल किए हैं। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि ऊर्जा तक पहुंच अभी भी विकास का बुनियादी आधार है।
उन्होंने कहा कि हर घर तक बिजली पहुंचाना जीवन स्तर सुधारने के लिए जरूरी है। इसी कारण भारत वैश्विक मंचों पर जीवाश्म ईंधनों को पूरी तरह समाप्त करने के बजाय ‘फेज-डाउन’ की वकालत करता रहा है।
2070 तक नेट-जीरो कार्बन का लक्ष्य
मंत्री ने कहा कि 2070 तक नेट-जीरो लक्ष्य हासिल करने की दिशा में परिवहन, आवास, जैव विविधता संरक्षण, स्वच्छ ऊर्जा और तकनीकी नवाचार सहित सभी क्षेत्रों में नीतिगत कदम उठाए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि बढ़ती गर्मी और हीटवेव की चुनौती से निपटने के लिए सरकार राष्ट्रीय कूलिंग एक्शन प्लान पर भी काम कर रही है।
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