जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए जरूरी फाइनेंस जुटाना दुनिया के सामने बड़ी चुनौती बना हुआ है। विकसित देशों की ओर से विकासशील देशों को पर्याप्त क्लाइमेट फाइनेंस (Climate Finance) नहीं मिलने के बीच एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत को अब घरेलू संसाधनों के जरिए फंड जुटाने पर अधिक ध्यान देना होगा।
बिजनेस टुडे इंडिया के मोस्ट सस्टेनेबल कंपनीज समिट एंड अवॉर्ड्स में आयोजित ‘क्लाइमेट फाइनेंस: द मिसिंग मनी’ सत्र में एक्सपर्ट्स ने ग्रीन टैक्सोनॉमी, जवाबदेही और नए वित्तीय मॉडल की जरूरत पर जोर दिया।
विकसित देशों के वादे और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर
पूर्व पर्यावरण सचिव लीना नंदन ने कहा कि ग्लोबल साउथ को विकसित देशों से मिलने वाला क्लाइमेट फाइनेंस बेहद सीमित रहा है। ऐसे में भारत को विकास और सतत विकास के बीच संतुलन बनाने के लिए नए वित्तीय उपाय तलाशने होंगे। उन्होंने बताया कि भारत ने इस दिशा में ऑफेंसिव और डिफेंसिव दोनों तरह की रणनीतियां अपनाई हैं। डिफेंसिव कदमों में कई क्षेत्रों के लिए कार्बन ट्रेडिंग को अनिवार्य बनाना शामिल है, जबकि आक्रामक रणनीति के तहत ग्रीन फंडिंग के लिए कंपनियों के साथ समझौते किए जा रहे हैं।
एलएंडटी फाइनेंस के हेड-सीएसआर एवं सस्टेनेबिलिटी समीर शर्मा ने कहा कि विकसित देशों ने हर साल 100 अरब डॉलर देने का वादा किया था, लेकिन 13 वर्षों में केवल लगभग 300 अरब डॉलर ही उपलब्ध हो पाए। उन्होंने कहा कि इसमें भी बड़ा हिस्सा वाणिज्यिक ऋणों का है, जो विकासशील देशों के लिए अतिरिक्त बोझ बनता है।
शर्मा ने सुझाव दिया कि भारत को अपनी घरेलू बचत का बेहतर इस्तेमाल करना चाहिए। उनके मुताबिक, भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) और पेंशन फंड्स के पास मौजूद विशाल पूंजी का एक हिस्सा जलवायु वित्त के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि जलवायु परियोजनाओं में लंबी अवधि और जोखिम को देखकर निवेशक अक्सर पीछे हट जाते हैं, जिससे फंड जुटाना मुश्किल हो जाता है।
इनगवर्न के एमडी श्रीराम सुब्रमणियन ने कहा कि सूचीबद्ध कंपनियां देश की जीडीपी में सिर्फ 15-20% योगदान देती हैं, लेकिन उन पर खुलासे और जवाबदेही का भारी दबाव है। इसके विपरीत, सार्वजनिक क्षेत्र और सार्वजनिक धन के बड़े हिस्से पर ऐसी सख्ती नहीं दिखती।
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