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All about Delimitation: भारत की आबादी हर साल तेजी से बढ़ रही है। देश में जनसंख्या के आधार पर ही एमएलए और सांसद तय किए जाते हैं। पिछली बार जनगणना 2011 में हुई थी और अब 2027 में होगी। बीते 16 सालों में देश की जनसंख्या में काफी इजाफा हुआ है। Worldometer के मुताबिक देश की आबादी इस वक्त 147 करोड़ है। 

इतनी बड़ी आबादी की संभालने और उनकी समस्या का सामाधान करने के लिए उतने ही हिसाब से एमएलए और सांसदों की जरूरत पड़ती है। इसलिए सरकार लोकसभा में डिलिमिटेशन (परिसीमन) बिल लेकर आई है।

ऐसे में हम सभी के मन में यह सवाल आता है कि आखिर ये डिलिमिटेशन यानी परिसीमन क्या है, डिलिमिटेशन बिल क्या है और इसकी जरूरत क्यों हैं?

क्या होता है डिलिमिटेशन?

डिलिमिटेशन एक सामान्य प्रक्रिया है, जो हर कुछ सालों में की जाती है। इसका उद्देश्य आबादी के हिसाब से लोकसभा सीटों की संख्या और उनकी सीमाएं तय करना होता है, ताकि सभी राज्यों को उचित प्रतिनिधित्व मिल सके। अब तक यह प्रक्रिया पांच बार हो चुकी है।

पहला डिलिमिटेशन 1952 में हुआ था, जो 1951 की जनगणना पर आधारित था और उस समय 494 लोकसभा सीटें तय की गई थीं। इसके बाद 1963 और 1973 में भी यह प्रक्रिया हुई। 1973 में, 1971 की जनगणना के आधार पर सीटों की संख्या 543 तय की गई, जब देश की आबादी करीब 54.8 करोड़ थी।

2002 में आखिरी बार बदलाव हुआ, लेकिन उस समय सीटों की संख्या नहीं बदली गई, सिर्फ उनकी सीमाएं बदली गईं।

डिलिमिटेशन क्यों है जरूरी?

डिलिमिटेशन इसलिए जरूरी है क्योंकि देश की आबादी काफी बढ़ चुकी है। इसलिए काफी जरूरी है कि नई जनगणना के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएं दोबारा तय हो ताकि हर सीट पर लगभग बराबर आबादी हो।

इसका उद्देश्य ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को बनाए रखना है, ताकि किसी क्षेत्र में ज्यादा और किसी में बहुत कम मतदाता होने की असमानता खत्म हो सके।

डिलिमिटेशन बिल क्या है?

संसद में आज डिलिमिटेशन बिल पेश किया है। केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने गुरुवार को कहा कि लोकसभा सीटों की कुल संख्या मौजूदा 543 से बढ़ाकर 815 कर दी जाएगी। 

प्रस्तावित ‘परिसीमन विधेयक-2026’ के माध्यम से एक नए परिसीमन आयोग का गठन किया जाएगा। यह आयोग नई जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाकर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों के वितरण का दोबारा निर्धारण करेगा, जिससे प्रत्येक राज्य में लोकसभा सीटों की संख्या में वृद्धि होगी।

इस प्रक्रिया को सुचारू बनाने के लिए संविधान के कुछ अनुच्छेदों में संशोधन किया जाएगा, ताकि सीटों का आवंटन वर्तमान जनसंख्या के अनुपात में हो सके। नए प्रावधानों के अनुसार, लोकसभा सदस्यों की अधिकतम संख्या 815 तक और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 35 सीटें निर्धारित की जा सकती हैं, जिससे कुल संख्या 850 तक पहुँच सकती है।

वर्तमान में सीटों का निर्धारण 1971 की जनगणना पर आधारित है, जबकि पिछले दशकों में देश की जनसंख्या और सामाजिक परिस्थितियों में भारी बदलाव आया है।

सरकार का तर्क है कि लंबे समय से लंबित इस पुनर्गठन को अब नए आयोग के जरिए पूरा किया जाएगा। विधेयक में यह भी व्यवस्था दी गई है कि महिला आरक्षण को नवीनतम जनगणना के आधार पर लागू किया जाएगा और आरक्षित सीटों को समय-समय पर बदला जाएगा, ताकि सभी क्षेत्रों की महिलाओं को प्रतिनिधित्व का समान अवसर मिल सके।

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