वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के बावजूद भारत में आम उपभोक्ताओं को अभी तक बड़ी राहत मिली हुई है। केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाने से बचते हुए कई कदम उठाए हैं, हालांकि एलपीजी सिलेंडर, इंडस्ट्रियल डीजल और प्रीमियम पेट्रोल के दाम बढ़ाए जा चुके हैं।
बीते 22 अप्रैल को ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया, जो दो हफ्तों में पहली बार हुआ। इसकी बड़ी वजह पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास सप्लाई को लेकर चिंता है, जहां से दुनिया की करीब 20% तेल और LNG सप्लाई गुजरती है।
ईरान द्वारा दो कंटेनर जहाजों को कब्जे में लेने की घटना ने सप्लाई बाधित होने का डर और बढ़ा दिया। जनवरी में करीब 63 डॉलर प्रति बैरल रहा भारतीय क्रूड बास्केट अप्रैल में औसतन 116 डॉलर तक पहुंच गया है।
सरकार ने क्या कदम उठाए?
सरकार ने कीमतों को काबू में रखने के लिए सप्लाई पर फोकस किया है। रूस से तेल आयात बढ़ाकर मार्च में रिकॉर्ड 22.5 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंचा दिया गया, जो कुल आयात का लगभग 50% है। वेनेजुएला से भी आयात बढ़ा है।
इसके अलावा, भारत ने रूसी बीमा कंपनियों की संख्या 8 से बढ़ाकर 11 कर दी है, ताकि जहाजों की आवाजाही सुचारु बनी रहे। रणनीतिक तेल भंडार में भी करीब 75% स्टॉक उपलब्ध है।
टैक्स के मोर्चे पर सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में ₹10 प्रति लीटर की कटौती की है। साथ ही डीजल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल के निर्यात पर विंडफॉल टैक्स बढ़ाया गया है, ताकि घरेलू सप्लाई प्रभावित न हो।
राज्य चुनाव के बाद भी नहीं बढ़ेंगे दाम
23 अप्रैल को पेट्रोलियम मंत्रालय ने साफ किया कि चुनाव के बाद पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाने का कोई प्रस्ताव फिलहाल नहीं है। हालांकि, इंडस्ट्री रिपोर्ट्स बताती हैं कि ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को रोजाना ₹1,500-2,000 करोड़ का नुकसान हो रहा है।
Moody’s Ratings ने कहा कि इतने बड़े नुकसान लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हैं। अगर कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो सरकार को या तो कंपनियों को मुआवजा देना होगा या फिर कीमतों में धीरे-धीरे बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है।
महंगाई पर असर
ईंधन की कीमतों में दबाव का असर महंगाई पर दिखने लगा है। मार्च 2026 में खुदरा महंगाई 3.4% तक पहुंच गई, जो फरवरी में 3.21% थी। वहीं थोक महंगाई 21 महीने के उच्च स्तर 3.88% पर पहुंच गई।
एलपीजी की कीमत बढ़ने से ईंधन और बिजली से जुड़ा खर्च भी बढ़ा है। कमजोर होता रुपया और महंगा आयात भारत के चालू खाता घाटे और आर्थिक वृद्धि पर भी दबाव डाल सकता है।
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